आजकल कलम भी चाहती है, छपना, बिकना, चमकना—सब एक ही साँस में। ना पसीना, ना प्रतीक्षा, पर नाम हो अख़बार की सुर्ख़ियों में। लेखक कहता है— “प्रकाशन मुफ़्त हो, मार्केटिंग आप देखिए, फेम भी चाहिए, और रॉयल्टी तो हक़ है मेरा।” पर वो भूल गया है कि किताब भी फ़सल …