मुझे कभी कुछ मुफ़्त नहीं मिला, न रोटी, न छत, न कोई सहारा मिला। बचपन भी ज़िम्मेदारियों में बीत गया, खुद से ही जीना सीखा, खुद ही संभाला। चौदह साल की उम्र में बोझ उठाया, खुद को ही अपना सहारा बनाया, जब लोग विरासत में घर पाते थे, मैंने किराये के घर में जीव…