मुझे कभी कुछ मुफ़्त नहीं मिला,
न रोटी, न छत, न कोई सहारा मिला।
बचपन भी ज़िम्मेदारियों में बीत गया,
खुद से ही जीना सीखा, खुद ही संभाला।
चौदह साल की उम्र में बोझ उठाया,
खुद को ही अपना सहारा बनाया,
जब लोग विरासत में घर पाते थे,
मैंने किराये के घर में जीवन बिताया।
कभी भूख ने चुपचाप सुला दिया,
कभी थकान ने आँसू छुपा लिए,
दुनिया ने हाल तक नहीं पूछा मेरा,
मैंने खुद ही अपने जवाब दिए।
आज खड़ा हूँ अपने दम पर,
अपना घर है, अपना काम है,
जिसने कभी सहारा नहीं दिया,
आज उसी दुनिया में मेरा नाम है।
मैं देता हूँ हाथ दूसरों को,
उनकी राहों को आसान बनाता हूँ,
पर जब अंधेरा मेरे पास आता है,
मैं फिर खुद ही दिया जलाता हूँ।
शायद मेरी किस्मत में यही लिखा था,
खुद से लड़ना, खुद ही जीतना,
न कोई साथी दुख में मिला,
पर खुद को ही मैंने जीना सिखा।
अब शिकायत भी नहीं किसी से,
न अफ़सोस किसी कमी का है,
जो कुछ भी हूँ, अपने दम पर हूँ,
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।