हाय रे ग़रीबी


हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है,

छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है।

सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती,

एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है।


काग़ज़ पूरे होते नहीं, बुलडोज़र पहले आता,

कानून किताबों में सोए, हक़ सड़क पर रोता जाता।

बैंक की क़िस्त रोज़ पूछे—“आज क्यों नहीं आया?”

जिसका घर ही टूट गया, वो जवाब कहाँ से लाया?


मां की चूड़ी बिक जाती, बच्चे की हँसी रुकती,

बीमारी दस्तक देती, दवा भी शर्तें थोपती।

बीमा काग़ज़ कहता है—“दर्द इसमें शामिल नहीं,”

गरीब का हर आंसू बोले—“मैं किसी फ़ाइल में नहीं।”


फिर भी वो झुकता नहीं, सुबह फिर उठ जाता है,

टूटी दीवारों के बीच, उम्मीद बोता जाता है।

अमीर के लिए नियम नरम, गरीब के लिए सख़्त,

इंसाफ़ भी तो देखो, तौलता है किसका वक़्त।


हाय रे ग़रीबी, तू अभिशाप नहीं सवाल है,

जो चुप रह जाए, समझो वही सबसे बेहाल है।

जिस दिन ये समाज बोले—“दोष तेरा नहीं,”

उस दिन शायद गरीब कहे—“हां, आज मैं अकेला नहीं।”

Rajender Singh Bisht

मैं राजेन्द्र सिंह बिष्ट, लोहाघाट, उत्तराखंड से हूँ। मुझे बचपन से ही पौराणिक और इतिहास की किताबों से लगाव रहा है। पिताजी के असमय स्वर्गवास हो जाने के कारण मेरा बचपन अन्य बच्चों की तरह नहीं बीत पाया, जिस कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी और भूख मिटाने के लिए ढाई सौ रूपये की नौकरी से शुरूवात की।

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मैंने अपने जीवन में सीखा है कि आपको अपनी सफलता के लिए आपको खुद ही काम करना होगा। यदि आप बिना कुछ करे सफलता पाना चाहते हैं तो कोई आपको सफल नहीं कर सकता है।

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