हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है,
छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है।
सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती,
एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है।
काग़ज़ पूरे होते नहीं, बुलडोज़र पहले आता,
कानून किताबों में सोए, हक़ सड़क पर रोता जाता।
बैंक की क़िस्त रोज़ पूछे—“आज क्यों नहीं आया?”
जिसका घर ही टूट गया, वो जवाब कहाँ से लाया?
मां की चूड़ी बिक जाती, बच्चे की हँसी रुकती,
बीमारी दस्तक देती, दवा भी शर्तें थोपती।
बीमा काग़ज़ कहता है—“दर्द इसमें शामिल नहीं,”
गरीब का हर आंसू बोले—“मैं किसी फ़ाइल में नहीं।”
फिर भी वो झुकता नहीं, सुबह फिर उठ जाता है,
टूटी दीवारों के बीच, उम्मीद बोता जाता है।
अमीर के लिए नियम नरम, गरीब के लिए सख़्त,
इंसाफ़ भी तो देखो, तौलता है किसका वक़्त।
हाय रे ग़रीबी, तू अभिशाप नहीं सवाल है,
जो चुप रह जाए, समझो वही सबसे बेहाल है।
जिस दिन ये समाज बोले—“दोष तेरा नहीं,”
उस दिन शायद गरीब कहे—“हां, आज मैं अकेला नहीं।”
