हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है, छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है। सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती, एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है। काग़ज़ पूरे होते नहीं, बुलडोज़र पहले आता, कानून किताबों में सोए, हक़ सड़क पर रोता जाता। बैंक की …