My Poems

हाय रे ग़रीबी

हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है, छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है। सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती, एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है। काग़ज़ पूरे होते नहीं, बुलडोज़र पहले आता, कानून किताबों में सोए, हक़ सड़क पर रोता जाता। बैंक की …

हसरत-ए-अरमां

चले थे बड़े गुमां के साथ दिल में हसरत-ए-अरमां लिए तलाश-ए-मजिल की निकल पड़े अन्जां राह पर.... निकल आये बहुत दूर कि दिखाई दी वीराने में धुंध रोशनी सी और धुधंली सी राह.... लेकिन जमाने की बेरूखी और गन्दी सोच तो देखिये बिछा दिये काटें राह में जमाने का …

दास्ता-ए-नेगी

बदल जायेगा ये जमाना, राहे नेकी पर चलने से तेरे गलतफहमी है तेरी, खुद को समझ और बदल। गर है तू गरीब तो अधिकार नही जीने का, कुछ करने का तुझे। गर है तू ईमानदार तो अधिकार नही रहने का तुझे समाज मे। गर है तू खिलाफ रिश्वत के तो काबिल नही तू नजरो मे नौकरशाहो की…

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