कलम की अधूरी साधना


आजकल कलम भी चाहती है,

छपना, बिकना, चमकना—सब एक ही साँस में।

ना पसीना, ना प्रतीक्षा,

पर नाम हो अख़बार की सुर्ख़ियों में।


लेखक कहता है—

“प्रकाशन मुफ़्त हो,

मार्केटिंग आप देखिए,

फेम भी चाहिए,

और रॉयल्टी तो हक़ है मेरा।”


पर वो भूल गया है

कि किताब भी फ़सल है,

बीज, पानी, समय माँगती है,

सिर्फ़ पोस्ट और पोस्टर से

इतिहास नहीं बनता है।


प्रकाशक ने भी सपना देखा,

“सबको मंच दूँगा, सबको मौका।”

इसी दरियादिली में

उसने अपनी ही नाव में

छेद करना सीख लिया।


जो कल तक छापता था शब्दों को,

आज हिसाब छाप रहा है—

काग़ज़, छपाई, गोदाम,

और वापस न लौटी किताबें।


मुफ़्त की भूख में

दोनों भूखे रह गए—

लेखक को पाठक नहीं मिला,

प्रकाशक को साँस।


कला सौदा नहीं,

पर साधना भी है।

बिना तपस्या की चाहत

सिर्फ़ शोर बन जाती है।


जिस दिन लेखक सीखे

वक़्त देना, सीखना, ठहरना—

और प्रकाशक सीखे

ना कहना, सीमा खींचना—


शायद उस दिन

किताबें फिर जिएँगी,

और शब्द

किसी की बदहाली की क़ीमत

नहीं चुकाएँगे।

Rajender Singh Bisht

मैं राजेन्द्र सिंह बिष्ट, लोहाघाट, उत्तराखंड से हूँ। मुझे बचपन से ही पौराणिक और इतिहास की किताबों से लगाव रहा है। पिताजी के असमय स्वर्गवास हो जाने के कारण मेरा बचपन अन्य बच्चों की तरह नहीं बीत पाया, जिस कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी और भूख मिटाने के लिए ढाई सौ रूपये की नौकरी से शुरूवात की।

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मैंने अपने जीवन में सीखा है कि आपको अपनी सफलता के लिए आपको खुद ही काम करना होगा। यदि आप बिना कुछ करे सफलता पाना चाहते हैं तो कोई आपको सफल नहीं कर सकता है।

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